बात उन दिनों की है जब स्नातक प्रशिक्षण के लिये कानपुर में हम सभी को प्रसूति प्रशिक्षण के लिये भेजा जाता था
हमारा कॉलेज अभी नया ही था इतने केस नहीं हुआ करते थे कि सभी को नियमानुसार प्रशिक्षण संभव हो सके
सो मानसिक रोग प्रशिक्षण हेतु पूरे बैच को आगरा (जहाँ बैच के कुछ युगल ने मौके का लाभ उठाकर प्रणय संबंधों में प्रगाढ़ता पर्याप्त कर बाद में शादी में परिवर्तित किया)
तथा प्रसूति प्रशिक्षण हेतु केवल पुरुष छात्रों को 4-4 के समूह में कानपुर के मेडिकल कॉलेज भेजा जाता था
(कानपुर में केवल मात्र पुरुष छात्रों की पोस्टिंग होने के कारण आगरा जैसे अवसर के लिये कोई गुंजाईश नहीं थी)
मई का महीना गर्मी वो भी कानपुर की गर्मी बात भी करो तो मुँह से आग निकलती थी ए सी/वे सी भूल जाओ पंखा भी मिल जाये तो आपकी किस्मत
हर 4 छात्रों के बैच को 21 डिलीवरी कराने का अनुभव होना आवश्यक था कानपुर के उस अपर इण्डिया अस्पताल में डिलीवरी पतझड़ के पत्तों की तरह होती थीं
मेरे साथ मधुसूदन जे पी सिंह और कुलदीप सक्सेना भी थे
हम सभी को लेबर कक्ष(जहाँ गर्भवती अपने बच्चे जनतीं थीं) कुछ फासले पर था और पहुँचने में लगभग 2 मिनट लगते थे एक वार्ड आया समय आने पर बुलाने आया करती थी
उन्हीं दिनों अस्पताल में दुर्भाग्य से गोलीबाजी हुई थी तथा किन्ही कारणोंवश गेट पर स्थित श्रीराम चाय वाले की दुकान मेडिकल छात्रों ने जला दी थी सो दहशत का माहौल हवा में था
अब डिलीवरी का कोई निश्चित समय तो होता नहीं सो दिन हो या रात कभी भी बुलावा आया सकता था
असहनीय गर्मी के बावजूद हम तीन फिर भी कुछ तमीज से सोते थे किंतु जे पी सिंह मात्र एक कपडा पहन कर ड्यूटी रूम में सोता सो बुलाने वाली आया भी बस दूर से आवाज लगाकर ही रात्रि में बुलाती थी
कुछ समय पहुचने और कपडे ठीक करने में भी लगता था परिणाम ये हुआ कि 19 डिलीवरी हमारे पहुंचने से पहले ही स्त्री विभाग की रेजिडेंट करा चुकी थीं 20 वी और 21 वीं बस अंतिम चरण में देखने को मिलीं
उन्ही दिनों एक दिन किसी कारणवश रेजिडेंट को बुलाने की जरूरत पड़ी इमेरजेंसी होने के कारण हम चारों ही रेजिडेंट डॉक्टर प्रीती दुबे (जो बाद में झाँसी में शिक्षक के रूप में भी रहीं )
के हॉस्टल के कमरे में जो कि पास ही था हम बिना इजाजत घुस गए
कमरा आम रेजिडेंट के रहन सहन की ही तरह अस्त व्यस्त था और हमारा यूँ घुस आना मैडम को पसंद न आया पहले इमेरजेंसी मैनेज हुई
सीधे तो वो डाँट न सकीं हमारी इस हरकत पर सबक सिखाने हेतु उन्होंने प्रसूति रोग सम्बंधित प्रश्न करने शुरू कर दिये ताकि हमारी धुलाई का अवसर उनको मिल सके
कुछ प्रश्नों तक हमने मोरचा संभाला प्रश्नों का स्तर बढ़ने लगा अब हम परेशानी में थे किंतु ऐसी बहुत सी स्थितियों से पहले भी निकल चुके थे
सो अवसर देख हमेशा की भांति हम साइड हो लिये मधु सूदन जो बैच का टॉपर था को भिड़ा दिया मैडम से
कुछ देर ये क्रम चलता रहा किन्तु मधु सभी प्रश्नों का सटीक उत्तर देता रहा तो मैडम को समझ में आ गया कि ऐसे काम नहीं चलेगा
अंततः वो सीधे ही रौद्र रूप में आ गईं और अन्य हिदायतों के अलावा वो विशेष आदेश भी सुनाया जिसमे किसी भी महिला डॉक्टर के रूम में घुसने की सख्त मनाही थी
मधु के इस ज्ञान और हुनर का लाभ हम बरसों तक उठाते रहे आज भी उसे जरूरत पड़ने पर छोड़ते नहीं हैं
मैं तो खुश किस्मत भी था मेरी मौखिक परीक्षा उसके पहले हो जाया करती थी सो अंक ठीक ठाक मिल जाते उसके बाद वालों को अंक पाने में मुश्किल तो होती ही थी
क्या दिन थे वो भी.....
मधु सूदन को शायद ये घटना याद होगी.
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