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Saturday, February 25, 2017

स्मारिका... "गिफ्ट"

आज से ठीक 33 वर्ष पूर्व की वो अभूतपूर्व घटना कैसे भुलाई जा सकती है जब हम दोनों पवित्र वैवाहिक बंधन में बंधकर जीवन भर एक दुसरे का साथ निभाने का वादा कर रहे थे विवाह के कुछ दिन पंख लगाकर इतनी तेजी से कैसे उड़ गए पता ही न चला मैं पी जी कर रहा था एवं मेरी सहृदय को इंटर्नशिप पूरी करनी थी सो मुझे अपने मेडिकल कॉलेज,झाँसी और उनको अपने मेडिकल कॉलेज,मुम्बई वापस लौटना ही था मैं एक दो दिन पहले ही झाँसी आ गया तो मित्रों ने अपनी आदतों के अनुरूप कुरेदना शुरू कर दिया सो "वो" बातें तो बताना संभव न था उनको गोली पिलाता रहा फिर कुछ मित्रों ने जानना चाहा भाई भाभी जी (उनकी) को क्या गिफ्ट दिया.?? अब माथा ठनका यार गिफ्ट तो दिया ही नहीं देना चाहिये था बहुत सोचा क्या करें कैसा गिफ्ट दूं और कब दूं.??? तुरंत दिमाग की बत्ती जली अभी दो दिन बाद ही जिस ट्रेन से वो मुम्बई जाएँगी वो झाँसी से गुजरेगी काफी देर स्टेशन पर रुकेगी भी वहीं मिलकर गिफ्ट पकड़ा दूंगा स्टेशन पर मिलेंगे ये सन्देश भी पहुंचा दिया गया गिफ्ट सरप्राइज रहे सो नहीं बताया गया अब सारा समय इसी सोच में जाता कि क्या गिफ्ट दूं क्योंकि गिफ्ट भी अनोखा और अनमोल होना चाहिये उन दिनों आज जैसा जमाना नहीं था इलेक्ट्रॉनिक सामान इतना उन्नत नहीं था फिर भी हॉस्टल में केवल मेरे ही पास एक कैसेट रिकॉर्डर और प्लेयर हुआ करता था प्यानो टाइप बटन वाला जिसकी बहुत डिमांड थी छीना झपटी थी हर कोई उसे अपने कमरे में ले जाकर संगीत सुनना चाहता था जो संभव नहीं था सो मैं तंग आकर कैसेट लगाकर उसे विंग के ठीक बीच में रखकर फुल वॉल्यूम पर चला देता था ताकि विंग में रह रहे सभी दोस्त संगीत का आनंद ले सकें इसे हम "मोहल्ला संगीत" के नाम से पुकारते और इस मोहल्ला संगीत की भी काफी डिमांड थी उन दिनों मैं शास्त्रीय संगीत का छात्र भी रहा हूँ सो कुछ उल्टा सीधा गुनगुना भी लेता था (ये मैं आज भी करता हूँ) सो सोचा बेकार ही सही अपनी आवाज में एक गाना रिकॉर्ड कर दे दूंगा जो एक यादगार गिफ्ट होगा और ऐसा ही मैंने किया भी श्रीमती जी मुम्बई जाने को ट्रेन में थीं मेरा मन था वो कुछ दिन और रुकें मेरे साथ ही झाँसी में किन्तु संकोचवश मैं ये कहने में हिचकिचा रहा था व्यथा दोस्तों को बताई तो साले छोड़ने वाले कहाँ थे पहले तो खूब हंसी उड़ाई खैर अंत में तैयार हो गए कि कोशिश करने में क्या जाता है दोस्त की खातिर ये भी सही ट्रेन झाँसी स्टेशन पहुंची सभी दोस्त मेरे साथ खड़े थे मैंने वो रिकार्डेड कैसेट का गिफ्ट श्रीमती जी को दिया दोस्तों ने मेरे ससुर श्री से मेरे ह्रदय की पीड़ा बाँची वो ठिठके थोड़ी देर चुप रहे फिर बोले इसके लिये हम तैयार नहीं थे खैर दो चार दिन के लिये उन्होंने श्रीमती जी को मेरे साथ झाँसी में ही रहने की अनुमति दी और बाद में हमने साथ ही अपनी पहली होली एक साथ झाँसी में मनाई जिसका अलग किस्सा है वो कभी बाद में उनके जाने का दिन भी आया और वो विरह के क्षण भी वो विदा हो गईं मुम्बई के लिये महीनों बाद जब वो दोबारा मिलीं तो मैंने पूछा गाना कैसा लगा.?? वो बोलीं कौनसा गाना अब मेरे चौंकने की बारी थी मैंने रिकॉर्ड कर सुन कर पक्का कर लिया था गाना सही रिकॉर्ड हुआ था अरे तुमको याद नहीं क्या मैंने मुम्बई जाते हुए तुमको एक कैसेट गिफ्ट किया था जिसमे मैंने एक गाना रिकॉर्ड किया तुम्हारे लिये बड़ी मेहनत से और गिफ्ट किया ताकि तुम भले साथ न थी मेरी बेसुरी आवाज तो सुन ही सकतीं थीं उनका उत्तर सुनकर मैं अवाक् रह गया अपना सर धुनता रहा अरे वो कैसेट वो तो अभी भी उसी तरह पैक रखी है ये सुनकर मेरा तो दिल ही बैठ गया हताश होकर मैं बोला मगर क्यों अरे भई हॉस्टल में हमारे किसी के पास कोई कैसेट प्लेयर नहीं है मैं उसे कैसे सुनती आज भी जब वो उत्तर मैं याद करता हूँ अपने सर के बाल नोचता हूँ मेरा अनमोल गिफ्ट यूँ ही पैक पड़ा था और वो मुस्कुरा कर मुझे और भी अपना सिर पीटने को मजबूर कर रहीं थीं... Dr.Nagar

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