डॉक्टर मिड्ढा हमारे इमीडियेट सीनियर हैं वो एक जीनियस बन्दे हैं मगर इसका प्रयोग वो सीधे रास्तों के करने के लिये लिये शायद दुनिया में नहीं आये हैं
हम सभी उनका सम्मान करते हैं मगर वो अपने तेज दिमाग का प्रयोग कॉलेज में उलटे पुल्टे काम करने में कैसे करते थे वो भुलाया नहीं जा सकता
बात उस समय की है जब हम MBBS के द्वितीय वर्ष और वो तृतीय वर्ष के छात्र थे
उन दिनों FB या WA जैसे साधन नहीं हुआ करते थे एक दुसरे से दोस्ती निभाने या प्रेम करने के लिये
किन्तु कोई भी समय इन कार्यों के लिये कोई न कोई सुविधा तो देता ही है
इन कार्यों के लिये उन दिनों अख़बार में पेन फ्रेंड बनाने का विज्ञापन दिया जाता था और उस विज्ञापन को पढ़कर अनेक समवयस्क मित्र बनते जो कई बार प्रेम में भी बदल जाता था
सो मिड्ढा साहेब ठहरे ऊंची बुद्धि वाले और उन्होंने भी दिया एक अख़बार में पेन फ्रेंड बनाने हेतु विज्ञापन
उनका पूरा नाम है "नलिन मिड्ढा"
केवल आज के दिन ही फरजी आई डी बनती हो ऐसा नहीं है ये कला उनको उसी समय मालूम थी जिसे हम सोच भी नहीं सकते थे
सो उन्होंने जान बूझकर विज्ञापन में लिखा थर्ड ईयर मेडिकल स्टूडेंट "नलिनी" मिड्ढा को अपना दोस्त बनाने के इच्छुक पत्र लिखें और अपने विचार भी विस्तार से लिखें
ये "नलिनी" जानबूझकर लिखा गया था ताकि एक मेडिकल की थर्ड ईयर की युवा छात्रा के लिये लोगों के मन के उदगार जान सकें
इतना ही नहीं उन्होंने अख़बार पोस्ट मैन को दिखाते हुए कहा यार देखो ये अख़बार वाले कितने पागल हैं मेरा नाम ही गलत छाप दिया तुम खुद ही देख लो तुम तो सभी के पत्र बांटते हो इस कॉलेज में कोई नलिनी मिड्ढा है ही नहीं सो जो भी पत्र इस नाम के मिलें वो मुझे देना बात पोस्टमैन को भी ठीक लगी सो सारे पत्र नलिनी मिड्ढा वाले उनको मिलते गए
अब जो भी पत्र पेन फ्रेंड के लिये लिखे जाते उनमें पते की जगह पोस्ट बॉक्स नंबर दिया जाता था ताकि सीक्रेसी बनी रहे
इसका परिणाम ये हुआ कि अनेकों अपने कॉलेज के ही कई दीवानों के खत मिड्ढा साहिब के हाथ लग गए
आप सभी उस आयु से निकल चुके हैं उस जवान उम्र में एक थर्ड ईयर की मेडिकल शिक्षा पा रही युवति के प्रति समवयस्कों के दिलों में कैसे हिलोरे मारते उदगार होंगे ये सभी अनुमान लगा सकते हैं खासकर महिलाऐं इन इस्थितियों में कैसे लेटर उनको प्राप्त होन्गे मेरे मुकाबले और भी अच्छी तरह से समझ सकती है
हुआ ये कि कई दिनों तक हॉस्टल में ये घोषणा होती रही की आमुक तिथि को कॉलेज के कुछ दिलफेंक महानुभावों के दिल के उदगार सभी के साथ पढ़े और सुनाए जाएंगे जो उन्होंने थर्ड ईयर की मेडिकल युवती के प्रति लिखे हैं
पत्र लिखने वालों के नाम भी तभी बताए जायेंगे संख्या क्योंकि काफी बड़ी थी सो इस काम के लिये लगातार 2 या 3 दिन की घोषणा की गयी वो भी रात्रि के समय जिससे अधिक से अधिक छात्रों को सुनाया जा सके
हॉस्टल में सभी बड़े अधीरता और उत्सुकता से घोषित तिथियों की प्रतीक्षा कर रहे थे कुछ के दिलों राज खुलने बॉकी थे
खैर वो दिन भी आए
रात को मिड्ढा साहेब हॉस्टल की छत पर मोर्चा सँभालते नीचे सैंकड़ों की संख्या में युवा छात्रों की बैचैन भीड़ जुटती कथा सुनने के लिये
पत्र लिखने वाले का नाम बताया जाता और उनके द्वारा एक थर्ड ईयर की युवा मेडिकल छात्रा नलिनी मिड्ढा की दोस्ती और प्रेम पाने के लिये क्या क्या और कैसे लिखा होता सभी को सुनाया जाता आप अनुमान लगा ही सकते हैं उन पत्रों में क्या लिखा होता होगा
जिन महाशय ने वो खत लिखा वो महीनों तक अपने सभी पुरुष मित्रों के कटाक्ष झेलते शर्मिंदा होते और मुँह छिपाते घुमते और सभी मित्र उनके लिखे शब्दों का चटखारे लेकर आनंद उठाते
कई दिनों तक ये अनोखा मनोरंजन कॉलेज में चलता रहा
सच में मिड्ढा साहेब एक मस्ती की महान हस्ती बने रहे.....
वो भी क्या दिन थे
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