बहुत से मित्रों का अनुरोध है कि मैं के जी ऍम सी के अपने अनुभव भी लिखूं
ये 1973 की अर्थात आज से लगभग 44 वर्ष पूर्व की बात है
कम ही मित्र जानते होंगे जब इंटरमीडिएट करने के बाद मैंने मेडिकल क्षेत्र में लखनऊ के मेडिकल कॉलेज में बी डी एस यानि डेंटल सर्जन के प्रशिक्षण के लिए प्रवेश पाया
वो समय आज से फर्क था बड़े पैमाने पर रैगिंग हुआ करती थी जिसके किस्से कुछ अलग ही हैं और मेरे मित्र सहपाठी और बड़े भाई चंद्रशेखर कौशिक जो आजकल अमेरिका में हैं बहुत बुद्धिमान हैं लिखने को बहुत अनुरोध करते हैं
उनके मन का किस्सा तो नहीं लिखूंगा लेकिन बताना चाहता हूँ कि अक्सर सीनियर जानना चाहते थे मैं किस बैच से हूँ तो इस प्रश्न का उत्तर देने की कला मैंने सीख ली थी मैं तपाक से कहता मैं "निकिता गुप्ता" वाले बैच से हूँ
मैंने पाया इतना सुनते ही अधिकांश सीनीयर की आँखों में एक अजीब सी चमक मैं अनुभव करता था वो न जाने किन मधुर ख्यालों में खो जाते और मैं सरक लेता और रैगिंग की पीड़ा से बच जाता था
कॉलेज मशहूर हस्ती के नाम लेने का कुछ तो लाभ होता ही है
आज भी मैं यही फॉर्मूला अपनाता हूँ और अपने को रवि कान्त,चंद्रशेखर या ऋषि रंजन के बैच वाला ही बताता हूँ और निकिता गुप्ता को भी खोज रहा हूँ हालाँकि और भी अनेक महान हस्तियां थीं बैच में जिनको मैं आज भी याद करता हूँ
उन्ही दिनों पहले धीरे धीरे लेकिन एक दिन अचानक भारी पेट दर्द से मैं पीड़ित होकर चिल्ला रहा था हॉस्टल में
हॉस्टल में रहते भले ही माँ बाप साथ नहीं होते किन्तु मित्र हमेशा साथ होते है जो हर कष्ट के क्षणों में देव तुल्य साथ देते हैं
पीड़ा से तड़पते देख मेरे मित्र भी उसी शाम मुझे इमेरजेंसी लेकर गए पीड़ा ज्यादा होने के कारण मुझे मेडिसिन विभाग में रोगी के रूप में भर्ती होना पड़ा
मुझे याद है मेडिकल छात्रों के लिये उस समय में वार्ड में अलग से रहने की अच्छी व्यवस्था होती थी सो मुझे भी मिली बढ़िया नाश्ता एवं खाना मिलता था मुझे याद है उन 2-3 दिनों के प्रवास में नाश्ते में मुझे 2 उबले अंडे भी दिए जाते मैं पिछड़ा पंडित होने के नाते अंडे खाता नहीं था,आज भी नहीं खाता सो जो भी मित्र सवेरे मुझसे मिलने आता वो उन अण्डों का आनंद उठाता
प्रथम दिन की बात है दर्द से परेशान जब मैं भर्ती कर दिया गया दर्द की दवा के साथ ही संभवतः कोई नींद की दवा भी मुझे दी गयी
मुझे बस इतना याद है मेरे अनेक मित्र मुझे वार्ड तक छोड़ने आये और उपचार दिलाया जिसके बाद मैं चैन से सो गया
भोर सवेरे लगभग 5 बजे मेरी नींद खुली तो पाया मेरे पलंग के साथ ही बैठा मेरा परम मित्र एवं रूम पार्टनर साथ के एक स्टूल पर बैठा पलंग के किनारे से सर टिकाए सो रहा है
देखते ही मैं समझ गया कि उसने अपने सारी रात के नींद और चैन को त्याग कर मेरे कष्ट के समय में सारी रात उसी वार्ड में पलंग के किनारे काटी
वो दृश्य याद कर आज भी मेरी आँखें नम हो जाती हैं
उसका मेरा कुछ ही दिनों का परिचय था फिर भी वो मेरा साथ रह और नींद त्याग मेरे पास क्यों रुक गया सारी रात उसका मेरा ये कौनसा रिश्ता था
उन दिनों फोन fb ता wa आदि साधन नहीं होते थे न ही कोई संपर्क
कॉलेज से निकल कर लगभग 38 वर्षों बाद उसका संपर्क पुनः मुझसे नेट द्वारा ही हुआ
मगर किस्मत को कुछ और ही स्वीकार था उसके बाद हम कभी एक दुसरे से मिल न सके
आज वो हमारी इस दुनिया को छोड़ तारों में कहीं वास करता होगा उसने जीवन में धन्यवाद कहने का भी अवसर नहीं दिया अचानक ही ऋणी छोड़ कर कूच कर गया
आज भी यही सोचता हूँ कोई भी पुराना मित्र के विषय में पता चले तो किसी भी तरह उससे मिलना और अपने दिल को शांति पाने का मौका देना मेरी तरह चूक न जाना
यही वो मित्र भी था जिसने के जी ऍम सी के बोर्ड पर लगी मेरे सेलेक्शन की मनचाही खबर देकर मुझ पर उपकार भी किया था
उस परम मित्र ब्रह्मलीन राजेंद्र मोहन गुप्त को मैं कैसे भुला सकता हूँ मैं उसका ऋणी हूँ
यही प्रार्थना करता हूँ वो जहाँ भी हो ईश्वर उसे सदा अपने सानिध्य में सुखी रखें
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