स्मारिका....
बात आज से 44 वर्ष पूर्व की है मैंने इंटरमीडिएट के बाद अपने मेडिकल कैरियर की शुरुआत 1973 में किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज में डेंटल छात्र के रूप में शुरू की थी
कॉलेज में प्रवेश का प्रथम दिवस था डॉक्टर बनने व् कहलाने की चिरपरिचित कितनी तीव्र इच्छा होती है सभी मेडिकोज अच्छी तरह जानते समझते हैं मैं भी अपवाद नहीं था
पिताश्री कॉलेज कैम्पस में मेरे साथ ही थे तभी कानों में किसी सीनियर के मधुर शब्द पड़े कहाँ से आए हो डॉक्टर ये तिलिस्मी शब्द डॉक्टर सुनते ही कानो में मिश्री से मीठा शब्द घुल सा गया सीना 56 नहीं 76 इंच जैसा फूल गया, समुचित उत्तर देकर दिन भर उन्माद से दिमाग भरा रहा अपने को एक बड़ा डॉक्टर समझकर
पिताश्री तो खैर वापस लौट गए
अगले ही दिन हॉस्टल में सीनियर सखाओं ने "अपने तरीकों से" डॉक्टरी का जो भूत उतारा वो भी कभी भुलाने योग्य नहीं है इसे मेरे और मित्र समझ ही चुके होंगे
इसी क्रम में कुछ दिनों बाद अब कारण याद नहीं डेंटल के छात्रों ने कॉलेज में स्ट्राइक और भूख हड़ताल कर दी थी सबसे जूनियर होने के नाते हमें भी इसमें भाग लेना ही था मन मारकर मैं भी एक दिन भूख हड़ताल पर बैठा
इतना ही नहीं सभी सीनिअर ने एक जुलूस भी निकाला जिसमे भेड़ों की तरह हमें आगे कर दिया गया था
द्वितीय वर्ष के छात्र एनाटोमी पास कर चुके थे सो एनाटोमी विभाग के पास आते ही उस भाषा के श्लोक उन्होंने बोलने शुरू कर दिए जिसका प्रयोग केवल हॉस्टल में ही होता था और वो भी प्राचार्य ए सी दास जो विभागाध्यक्ष भी थे के नाम सहित
दुर्भाग्य ये कि शायद उन्होंने झरोखे से शक्ल मेरी देख ली जबकि मैं उस भाषा को सीख भी नहीं पाया था उन दिनों
एनाटोमी के बारे में आपको बता दूँ विछेदन कक्ष में जहाँ लगभग 250 छात्रों (200 MBBS एवं 50 BDS) का समूह बैठता था जब दास साहिब पिन ड्राप ख़ामोशी के बीच अपने विभाग के अन्य डॉक्टर सहित लाव लश्कर लेकर विछेदन कक्ष से शहनशाह की तरह गुजरते थे तो सभी सावधान खड़े छात्रों की तो छोडो अगर मुर्दों में भी जान होती तो उनकी भी रूह कांप जाती दास साहिब के रॉब से
साल तक तो ठीक चलता रहा लेकिन क्योंकि मेरी शक्ल शहनशाह को याद रह गयी थी सो मेरे वार्षिक परीक्षा पर बैठने पर रोक लगा दी गयी
तुर्रा ये कि मैंने डाक्टर बिसारिया की क्लासेस 75%की जगह 74% ही अटेंड की हैं ये संख्या .98 लेक्चर यानि एक से भी कम अटेंड न करने की बताई गयी जबकि डॉक्टर बिसारिया जिनको मैं अपने मेडिकल कॅरिअर का सर्वोत्तम शिक्षक मानता हूँ क्लास छोड़ने का तो प्रश्न ही नहीं
लेकिन आदेश शहनशाह का वो भी अटल कितने प्रमाण दिए विनय की यहाँ तक कि डेंटल विभागाध्यक्ष डॉक्टर चावला से भी कहलाया मगर बादशाह टस से मस न हुए
घटना ऐसी कि किसी से कह भी नहीं सकते वो छात्र जो शहर में टॉपर में था पढाई न करने का दोषी बताकर परीक्षा से रोक दिया गया शर्म से घर भी नहीं बता सकते थी
जीवन के सबसे ज्यादा टेंशन भरे क्षणों में था वो समय
कोई बात नहीं हिम्मत नहीं हारी CPMT की तैयारी और प्रोफेशनल की साथ साथ तैयारी में जुटा रहा
ईश्वर ने साथ दिया MBBS में चयन हो गया
अब क्या था अब तो हम शेर थे युद्ध जीते योद्धा सामान
उन शहनशाह को अब मजा चखाना था सो अब सर ऊंचा कर जोश में घुसे उनके कक्ष में
सर मैं निर्दोष हूँ आप बताइए परीक्षा से रोकने का आदेश वापस होगा या नहीं
आवाज में गूँज और धमकी भी थी ये समय उनके चौकने का था उम्मीद के अनुरूप उत्तर नकारात्मक था
वो लिखित आदेश उनके सामने ही फाड़कर चुनौती पूर्ण शब्दों में जो चाहो कर लो के उदघोष के साथ उनकी टेबल पर दे मारा ये भी कहा आपके चैम्बर के सामने ****** करके जा रहा हूँ अब नहीं आऊंगा जो चाहे उखाड़ लेना
प्रोफेशनल कॉलेज में अन्याय की ये पहली घटना थी जो उनमें से एक रही जिसने मुझे बाद में LLB करने और अपने हक़ के लिए लड़ने को प्रेरित किया
यद्यपि बाद में अनुभव से दो बातें और सीखीं
1- वो उनके सामने ही उनके चैम्बर में की गयी हरकत शायद जवां खून का परिणाम थी नहीं होनी चाहिये थी
2- इस देश में कानून की कोई खास मान्यता नहीं
अनुभव अपने अपने...
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