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Thursday, August 17, 2017

स्मारिका-देश का कानून और पुलिस व्यवस्था...

ये उन दिनों की बात है जब मैं इस महान देश की सरकार की नौकरी करता था,मेरा प्रतिदिन का काम था मेरे निवास से रुड़की नौकरी पर बस से जाना और लौटना घर से ये दूरी लगभग 77 कि मी थी
मैं प्रतिदिन जिस बस से जाता वो मेरठ से शिमला जाती और मेरठ से सवेरे 6 बजे चलकर मेरे गाँव 6:45 बजे आती और रुड़की अस्पताल में मैं 9 बजे तक पहुँच जाता था
मुझे याद है अक्सर अधीक्षक महोदय झीकते रहते देखो ये इतनी दूर से आ गया और लोकल वाले अभी सो कर नहीं उठे घर में ही हैं
बस का चालक उन दिनों 55-60 की आयु के होंगे कन्डेक्टर लगभग 30 वर्ष का

नित्य का सवारी होने के नाते मुझे वो पहचानने लगे थे जानते भी थे ये सरकारी सेवा में चिकित्सक हैं सो उनका व्यवहार मेरे प्रति विशेष स्नेह व् सम्मान वाला था

अनेक बार मेरे थोड़ा बहुत लेट हो जाने पर भी बस रोक मेरी प्रतीक्षा करते उनके नाम कभी जान नहीं पाया ड्राइवर को "ताऊ" व् कन्डेक्टर को "पंडित जी" कहकर वो आपस में पुकारते सो मैं भी उन्हें इसी नाम से जनता भर था

नौकरी छोड़ने के बाद भी जब उत्सुकतावश मैंने जानकारी रोडवेज से ली तो पता चला एक दिन गाड़ी गर्म हो जाने पर "ताऊ" ने बस का रेडिएटर खोल दिया खौलते पानी से वो झुलस गए व् उसी के कारण मृत्यु को प्राप्त हुए,पंडित जी का पता नहो लगा मुझे क्या हुआ

सारे वर्ष चाहे झुलसाती गरमी हो बरसात या ठिठुरती सरदी यही क्रम रहता हम तीनों का

एक दिन की बात है सरदी अपने पूरे चरम पर थी सड़क पर सन्नाटा गहरा कोहरा छाया हुआ था हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा कंपकंपी के साथ ही कुछ दिखाई भी नहीं दे रहा था विसिबिल्टी जीरो थी उस दिन

खैर रोज़ की तरह यात्रा ठीक ठाक शुरू की पुरकाजी कसबे के निकट जो मेरे अस्पताल से करीब 30-35 किलोमीटर दूर रहा होगा अचानक उस ठंडे मौसम की सुबह बस में जोरदार ब्रेक लगे अनेक सवारी सहित मैं भी सामने की सीट से टकराया हल्की चोट सभी को लगी सवारियां परंपरा के अनुसार  चीखने लगीं बुड्ढे क्या कर रहा है गाड़ी ठीक से नहीं चला सकता क्या
"ताऊ" को ये बहुत बुरा लगा जोर से जवाब दिया आ आगे आकर देख ब्रेक न लगता तो बन गयी होती तुम सबकी चटनी
वो सही कह रहे थे जब देखा तो पता लगा उस कोहरे में दो ट्रक आमने सामने टकरा गए थे घने कोहरे के कारण और तेज ब्रेक के ही कारण हमारी बस भी बस उनमें से  एक ट्रक जो सड़क पर ही था से बस कुछ ही इंच फासले पर रुक गयी थी,शायद हमारी किस्मत व् ताऊ की समझदारी उस दिन अच्छी थी

उसी दुर्घटना जो कुछ ही मिनटों पहले हुई थी ट्रक में बैठे लोगों में से तीन स्वर्ग सिधार चुके थे जिनको घसीट कर सड़क की किनारे रख सफ़ेद चादर से वहां के निवासियों ने ढक दिया था
लगभग 5 अन्य बुरी तरह घायल चारो ओर खून सड़क पर और वो बुरी तरह दर्द से चीख चिल्ला रहे थे उनके साथ ही लोकल ग्रामीण भी मदद की गुहार लगा रहे थे

हालाँकि मेरे लिये ये नजारा इतना नया न था अस्पताल में ऐसे दृश्य होते है लेकिन सभी सवारी बहुत विचलित और गंभीरता से ये सब देख अब ताऊ को धन्यवाद दे रहे थे जान बचाने के लिये

सौभाग्य से मेरी उस दिन इमेरजेंसी ड्यूटी भी शुरू होने वाली थी,सबसे निकट का बड़ा अस्पताल भी वोही था
उन घायलों का सब तमाशा देख रहे थे आते जाते छोटे बड़े किसी भी वाहन में उनकी कोई मदद नहीं कर रहा था जैसी हमारी परंपरा है सभी तमाशा देख उनकी चीखें सुन आगे बढ़ रहे थे सड़क पर उनको मरने के लिये छोड़

मैंने कन्डेक्टर को बताया मेरी ही ड्यूटी है इन घायलों को बस में बिठाकर,लिटाकर ले चलो मैं भरती कर लूँगा ईलाज के लिये बस में काफी जगह खाली भी थी

मेरी बात सुन व् मेरे से परिचित होने के कारण वो दोनों अर्थात ड्राइवर व् कंडक्टर तैयार हो गए घायलों को बस से ले जाने हेतु ताकि समय बचे और उनका ईलाज व् जीवन रक्षा संभव हो सके

तभी पीछे से कोई सवारी चिल्लाई अरे ऐसा मत कर पुलिस केस है तुझे थाने में बिठा लेंगे इन्क्विइरी होगी फंस जाओगे
दोनों ठिठके
मैंने कहा मैं साथ हूँ क्यों घबराते हो लाने वालों में मैं अपना ही नाम लिख कार्यवाही पूरी करूँगा मुझे ही तो करनी  है ये सब लिखा पढ़ी

उनकी हिम्मत बढ़ी और चले वो घायलों की मदद कारने

तभी पीछे से दूसरा व्यक्ति चिल्लाया अरे बस में इनका खून लग जायेगा डॉक्टर का कुछ नहीं होगा पुलिस सूंघती हुई पहुँच जायेगी तेरे पास

ये सुनते ही उन दोनों की पूरी हिम्मत टूट गयी और लाख समझाने पर भी वो न रुके बस आगे बढ़ गयी

घंटों तड़पने के बाद वो मेरे अस्पताल में मेरे सामने थे ईलाज का गोल्डन पीरियड निकल चुका था और वो भयानक पीड़ा से तड़पने को मजबूर थे

जिस देश के कानून और पुलिस तंत्र पर लोगों को भरोसा न हो जो उनकी सहायता के स्थान पर उनमें डर और संवेदन हीनता को जन्म देता हो
यहाँ तक कि उन आमजन की ये मजबूरी हो कि एक निःसहाय घायल भले ही सड़क पर असहनीय दर्द में तड़पता रहे या मर भी जाये लेकिन कोई उनकी मदद को आगे न आ सके
ऐसे कानून और पुलिस तंत्र वाले देश पर कैसे गर्व करूँ मैं.??
ये घटना मुझे  हमेशा अंदर तक झंझोड़ती है कितना असहाय,निर्दयी आए अमानवीय बनाती है हमें इस देश की कानून और पुलिस व्यवस्था
हम ये भी नहीं सोच सकते कि हम या हमारे अपने के साथ भी ऐसा हो सकता है

गर्व नहीं धिक्कार है ऐसी व्यवस्था पर...

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