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इस बार पुनः एक दुःख भरी याद
ये घटना 31 अकटुबर 1984 की है,जी हाँ भारत के इतिहास में भी दर्ज है ये तिथि काले दिन के रूप में अलग अलग कारणों से
जी हाँ आप सभी को भी याद होगा इस तिथि को इंदिरा जी की हत्या हो गयी थी देश में जबरदस्त शोक और रोष का वातावरण था
मेरी स्नातकोत्तर परीक्षा पास ही थी और मुझे अपने घर से झाँसी परीक्षा, जो निकट ही थी के लिए पहुंचना जरुरी था
आगे बाधा न आये और यथाशीघ्र मैं झाँसी पहुँचूँ इसी उद्देश्य से सवेरे ही घर से एक सरकारी बस से निकल चला दिल्ली के लिये
शुरू में सभी ठीक चल रहा था,लेकिन वातावरण में एक अजीब से भय की गंध थी लोग और मैं भी दुखी और हतप्रभ थे घटना से
बस मोदीनगर तक ठीक चली आयी तभी देखा कुछ पुलिस वालों ने बस रोकी,ताका झांकी की कुछ आपत्तिजनक नहीं पाया
लेकिन मेरे आश्चर्य की उस समय सीमा नहीं रही जब पता चला वो बस में सरदारों को खोज रहे थे जो बस में मिले ही नहीं,इतना ही नहीं वो सभी यात्रियों को उकसाने लगे कि कोई भी सरदार यदि दिखे तो उसको खूब मारा पीटा जाये किसी का कुछ नहीं बिगड़ेगा
भय और अराजकता भरे उस दिन राम का नाम लेता दिल्ली पहुंचा डरा हुआ इसलिये था सड़कों पर खुला हुड़दंग चल रहा था और भीड़ तंत्र में कुछ भी संभव था खुद को सुरक्षित अनुभव कर नहीं पा रहा था
खैर दिल्ली के अन्तर्राजीय बस स्टॉप पर पहुँच कर दंग रह गया
हमेशा बसों और यात्रियों की भीड़ से लबा लब भरा रहने वाला वो स्थान एक दम वीरान और शमशान की तरह सुनसान मिला,देखते ही देखते मिनटों में मेरी बस के यात्री भी कुछ ही क्षणों में इधर उधर होकर गायब हो गए
वातावरण में हर ऒर धुआं दिख रहा था बाद में पता चला वो दुकान मकान जलाने से हो रहा था
जीवन में उस दशा में कभी भी मैंने दिल्ली का ISBT नहीं देखा था आज भी वो छवि दिमाग की भय वाली कोठरी में अंकित और ताज़ा है
अभी मुझे रेलवे स्टेशन पहुंचना था कोई साधन नहीं मिल रहा मैं भयभीत था
बाहर निकला एक ताँगा दिखा जिसमे कुछ यात्री थे मैं भी उसी में सवार हो गया स्टेशन जाने के लिये उसके मुंह मांगे पैसों को स्वीकार कर
रास्ते भर लूट पाट मारपीट हो रही थी कई सरदार लहूलुहान ईधर उधर भाग राहे थे
एक दुकान का कुछ लुटेरों ने शटर तोड़ सामान लूट रहे थे,मुझे याद है वो घड़ियों की दुकान थी
सारी सुनसान और अराजक सड़कों से निकल किसी तरह नई दिल्ली स्टेशन पहुंच टिकट खिड़की से झाँसी का टिकट माँगा
कौनसी गाड़ी का दूँ.??
क्या मतलब.??
अरे भाई दो गाड़ी जाने वाली हैं,एक एक्सप्रेस छत्तीसगढ़ वाली,दूसरी सुपरफास्ट दक्षिण की ओर जाने वाली
दोनों के किराये में अंतर था और सुपरफास्ट समय कम लेती थी मैं जानता था
भाई जो सबसे जल्दी पहुंचे अर्थात सुपरफास्ट का टिकिट दो
टिकिट ले चढ़ चला गाड़ी में
यहाँ भी भय और आतंक ही छाया हुआ था हर ओर
खैर गाड़ी चली सभी यात्रियों ने सब खिड़की दरवाजे बंद कर लिए गाड़ी पर भी पथराव हो रहा था बहार से जिसके टकराने की कर्कश आवाज और भी आतंक पैदा करती
अगला स्टॉप आगरा समय से निकल गया
जैसे ही गाड़ी धौलपुर स्टेशन पहुंची रोक दी गयी जबकि वहाँ स्टॉप नहीं था
बंद खिड़की दरवाजों से भी बाहर से आती हुड़दंग और मानवों के चीखने की आवाजें साफ आ रही कानों में सभी सहमे और डरे हुए यात्री थे
तभी भीड़ से आवाज आई दरवाजा खोलो
सब डर गए मैं भी समझ आ गया अब सभी लूटे और पीटे जायेंगे सो कोई हिम्मत नहीं कर पा रहा था बंद दरवाजा खोलने की
सभी डर से काँप रहे थे
तभी कुछ आवाजें भीड़ से गूँजी
हम तुम्हें कुछ नहीं कहेंगे हमें पता है अंदर सरदार हैं उनको हमें दे तो बस
कोई नहीं उठा
अच्छा दरवाजा नहीं खोल रहे
तो हम आग लगा रहे हैं तुम्हारे डब्बे में
इतना सुनते ही किसी ने मज़बूरी में दरवाजा खोला तो 20-30 आदमी जो लाठी डंडों और हथियारों से लैस थे घुस आए
मैं दुबक गया अपनी सीट में जो एक यात्री के लिए खिड़की के पास बनी सीट होती है
ढूंढने पर डब्बे में कोई सरदार उनको नहीं मिला सो निकल लिये वहां से
लेकिन अब खिड़की खुल चुकी थी बाहर निगाह गयी तो बड़ा वीभत्स दृश्य था
सरदारों के साथ मार पीट तो चल ही रही थी वो घायल होकर बदहवास भाग रहे स्टेशन पर इधर उधर चीख पुकारें सुनाई दे रहीं पर हम सब मजबूर और अपनी जान की ही खैर मना रहे थे
खुद मैंने कुछ लोगों को दो सरदारों में एक के कपडे और दूसरे की दाढ़ी में आग लगाते देखा
मन धक् से रह गया धड़कने छाती फाड़कर बाहर आने को थी
थोड़ी ही देर बाद पता चला कि कुछ सरदार छुप कर एक डब्बे में बैठे थे वहां रक्तपात हुआ है
सब यात्री वहां देखकर आ रहे थे
मेरे पास सामान था जाना चाहता नहीं था फिर भी सामान का लालच छोड़ मैं उधर बढ़ा
देख कर भय और दुःख से मिश्रित भावनाएं थी
पुरे डब्बे में हर ऒर खून फैला हुआ था और चीख पुकार मची थी किसी की हिम्मत नहीं थी बोलने की
वो वीभत्स दृश्य मेरे दिमाग में है जिसे मैं कभी याद करना नाहीं चाहता
कुछ समय बाद गाड़ी चली झाँसी स्टेशन और फिर हॉस्टल पहुँच कर और भी दुःख हुआ
हॉस्टल में कोई सरदार था जूनियर बीच का नाम मुझे अब याद नहीं वो कानपुर का रहने वाला था,मिले समाचारों के अनुसार उसके परिवार में कानपूर में हत्या कर दी थी,वो बिलख रहा था दहाड़ें मार कर रो रहा था सभी साथी उसे जबरदस्ती रोक रहे थे क्योंकि वो अपने घर कानपुर जाना चाहता था
मैं उसके पास गया रेल में चल रही घटनाओं को संक्षेप में मैंने उसे समझाया और जाने को मना किया
मुझे याद है मैंने उसे कहा तुम नहीं मानोगे तो नीश्चित समझो तुम भी अपने घर जिन्दा पहुँच नहीं पाओगे
मुझे याद है अपने कॉलेज में भी हमने अपने साथियों को उनके कमरों में बंद कर भोजन आदि वहीँ पहुंचा कर और पहरा देकर उनकी रक्षा की कोशिश की थी
मुझे मालूम है इस पीड़ादायक लेख के कारण अनेक साथियों और घटना में दुखः पाये मित्रों को ये याद कर कष्ट होगा,सो पहले ही क्षमा प्रार्थी हूँ
आपने ये सब लाइव नहीं देखा होगा मेरा दुर्भाग्य वो सब मंजर मैंने अपनी आँखों से देखा
किन्तु मूल प्रश्न ये जिन्होंने शारीरिक और आर्थिक यातनाएं झेली उनका दोष क्या था.???