स्मारिका...
बात 1984 की रही होगी पी जी पूर्ण कर अपनी सरकारी सेवा की नई और प्रथम पोस्टिंग पर पौड़ी के कोट महादेव नामक स्थान पर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र का प्रभारी बनकर कार्य सँभालने गया
नाम के अनुरूप ही सुंदर स्थान था,कृपा के लिये प्राचीन शिव मंदिर,पहाड़ों के दिलकश नज़ारे,कल कल बहते पानी के अलावा एक 300 फुट का वाटर फाल भी,शीतल और कभी सर्द हवाएं,पहाड़ों पर जमे बादल पैरों को भिगोते
मात्र 11-12 घरों का गाँव रहा होगा किस परिवार में कितने बच्चे ही नहीं,कुछ दिनों बाद ये भी याद रहता किस के घर में कितने जानवर हैं,कितनी मुर्गी हैं और उनके दिए अण्डों से चूजे कब निकले थे
संतोष का माहौल था
चार्ज लिया श्रीमान डा0 संतोष श्रीवास्तव से,चार्ज के बाद एक अनकही परंपरा होती थी,आते डा0 को उस स्थान की अच्छी-बुरी बातों से अवगत कराना
सो डा0 श्रीवास्तव ने जाते जाते बताया यहाँ एक @@@@ मोहन नाम की वारिष्ट स्टाफ हैं उनका आतंक है आप उनसे बच कर ही रहे ये आपके हित में होगा
कालांतर में पता लगा भीमकाय,लगभग 5 फुट 8 इंच की ये हृष्ट पुष्ट महिला थीं जिनके हर प्रकार के सम्बन्ध एक राज्य मंत्री से बताए जाते पूरा रौब था उनका,ये अस्पताल तो क्या CMO और DM तक उनसे पंगा लेने की हिम्मत नहीं रखते थे
वैसे भी वो पहाड़ के जौनसार बाबर क्षेत्र से आती थीं जहाँ 5 तक पति रखने की ज्ञात परम्परा थी,चार के नाम तो मैंने ही उनकी सेवा पुस्तिका में चढ़े पाये
अंतरंग संबंधों के दुरूपयोग सम्बंधित शब्दों,जिसे आम लोग "गाली" के नाम से जानते हैं का इतना गहन ज्ञान व प्रयोग था उनका कि हॉस्टल में अपने को धुरन्धर समझने वाला पुरुष भी हार जाये उनसे
यही शब्द हर सुबह वो डा0 सहित सभी स्टाफ को सुनाती और ज्ञान वृद्धि में सहायक होती
अंदर ही अंदर विवशता की आग में जल भुनकर रह जाते,सभी त्रस्त थे,त्राहिमाम करते रहते
मैं भी कोई अपवाद नहीं था मगर क्या कर पाता
कुछ दिन उनके मधुर प्रवचन चले लगा कुछ ईलाज करना ही होगा इनका
एक दिन मौका मिला अस्पताल का फार्मासिस्ट उनकी शिकायत लेकर आया तो मैंने उसे बहुत डाँटा साले मर्द होकर एक महिला को नहीं डील कर सकता (महिलाऐं कृपया क्षमा करें,ये ईलाज का ही एक सोचा समझा रास्ता मुझे दिखा)
क्या करूँ साब
कल जब तंग करे तो खींच कर दो झापड़ देना
मेरी नौकरी तो गयी साब फिर तो
अरे नहीं जाँच में तो मेरा ही नाम होगा सब सम्भाल लूँगा,जब मैं हूँ तेरे साथ तो डर क्यों रहा है
पर साब वो तो 6 फुटी है मुझे ही किनारे लगा देगी,वो खुद भी बस 5 फुट 1 इंच रहा होगा पतला दुबला,सही ही कह रहा था
धत्त नालायक,इतना ही डरपोक है तो एक हॉकी रख ले साथ में,ये मेरठी तरीका सुनकर वो तैयार हो गया,शाम ठीक बीती
मैं भी सोच चुका था क्या कर लेगी डा0 से चपरासी तो बनवा नहीं देगी,नौकरी भी चली गयी तो रोज़ रोज़ की इस जलालत से मुक्ति मिलेगी
अगली सुबह जब मैं अपनी ओ पी डी में बैठा था तो अगले कमरे में जो फार्मासिस्ट का था गरमा गरमी शुरू हो गयी,उसने प्लान के अनुसार हॉकी जैसे ही निकाली, उम्मीद के अनुरूप उस महिला ने उससे हॉकी भी छीन ली
वो मरता क्या न करता एक जोर का धक्का उसने महिला को दिया तो वो लड़खड़ाते हुए अंदर मेरे चरणों में गिरी,चोट से अधिक उसका पहनावा अस्त व्यस्त हो गया और बहुत कुछ सामने दिखने लगा ये मार उस महिला के लिये बहुत खेदजनक थी,चाहे उसे गाली सुनाने में कितनी ही महारथ क्यों न थी
मैं तुम सबको देख लूंगी,और न जाने क्या क्या बड़बड़ाते हुए वो बहार निकल गयी
मेरे और उस फार्मासिस्ट के लिये तो वो विशेष शब्दों का उच्चारण कर रही थी
हम ये सब कर तो गए किन्तु सभी लोग ख़राब भविष्य और परिणाम की आशा में थे
ईश्वर ने लाज रखी,कुछ दिनों बाद सूचना मिली उसने कहीं सुदूर और जिले के बाहर अपना ट्रांसफर करा लिया
जिला अब आतंक से मुक्त था मेरे अस्पताल के कर्मी इस दासता से मुक्ति पाकर जश्न मना रहे थे,वो फार्मासिस्ट अब हीरो था और मेरा रुतबा भी बढ़ चुका था,अच्छा ये डा0 है जिसने @@@@ मोहन का ईलाज किया है
CMO ने भी (अकेले में) मेरी पीठ ठोकी,आतंक एवं गालियों से मुक्ति के बाद मैं भी संतुष्ट था
इस रौब और मेरे स्टाफ के साथ भिन्न किन्तु मधुर व्यव्हार के कारण बाद का समय निष्कंटक सा ही बीता (कुछ घटनाओं के अलावा,जो फिर कभी लिखूंगा)
महिला के प्रति,चाहे वो कैसी भी थी,हिंसा का रास्ता अपनाना शायद सही नहीं था,मुझे उसका आज भी खेद है,मैं महिलाओं का पूर्ण सम्मान करता हूँ,किन्तु इस महिला के आचरण के सामने विवश था,कोई और हल मेरे सामने नहीं था
क्या आप बताएंगे यदि आप मेरे स्थान पर होते तो क्या करते.???

बहुत बढिया सर,,,,लातों के भूत बातों से नही मानते
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